Policy Impact of MAD Activism

The State of Uttarakhand had enacted the Uttarakhand Anti-Spitting and Anti-Littering act in 2016, which clearly provided for not only fines for the actions of spitting and littering, but also had provisions for arrest of those reasonably suspected for it and was there for a comprehensive legislation dealing with public hygiene and health standards. In 2019, Mr. Adarsh Tripathi, a member our student activist group, Making a Difference by Being the Difference (MAD) had filed a Right to Information application with the State Government of Uttarakhand, requesting information about the number of fines collected y the 100 Urban Local Bodies of Uttarakhand. In response, Mr. Tripathi was informed that out of the 100 Urban Local Bodies, only 9 Urban Local Bodies had at all collected an amount of Rs. 50,000 as fines through the Act over a period of 3 years and there were 39 Urban Local Bodies who had collected an amount of Rs. 0 as challan under the provisions of the Act.

In the present environment of the Corona pandemic, when it is known that the novel coronavirus (Covid-19) spreads through microscopic droplets, the “thookta hai” culture can prove to be fatal quite literally. Therefore, a Public Interest Litigation was preferred by MAD’s Founder and lawyer activist Mr. Abhijay Negi to highlight the attention of the Honourable Court towards the lack of action for any implementation of the provisions of the Uttarakhand Anti-Spitting and Anti-Littering Act.

Taking the matter seriously, the Honourable High Court of Uttarakhand at Nainital has now directed the State Health Secretary and the State Urban Development Secretary to file a report before the Court about their efforts to popularize the provisions of the 2016 Act among the masses of Uttarakhand and to ascertain what steps they are likely to take to ensure compliance of the provisions of the same.

नैनीताल उच्च न्यायाल ने, मैड के संस्थापक, सामजिक कार्यकर्ता एवं हाई कोर्ट अभिवक्ता, अभिजय नेगी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य में कूड़ा फेंकना एवं थूकना प्रतिषेध अधिनियम 2016 के अंतर्गत राज्य सरकार एवं शहरी स्थानीय निकायों द्वारा किया जा रहा असन्तोश्जनक काम माननीय उच्च न्यायाल को अवगत करवाया। गौरतलब है कि उत्तराखंड में इस अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान हैं कि थूकना और कूड़ा फैलाने के फलस्वरूप 5000 रुपये तक का जुर्माना, रोजना हो रहे कूड़ा फेंकने की गतिविधियों पर 500 रुपये तक का जुर्माना एवं थूकने पर भी इसी तरह की कार्यवाही का बखान किया गया है और जेल जाने तक का भी प्रावधान किया गया है। जब देहरादून में पर्यावरण संरक्षण पर काम कर रहे युवाओं के संगठन मैड सांस्था द्वारा इस बात को सूचना के अधिकार के माध्यम से पूछा गया कि 2016 से 2019 तक इस अधिनियम के तहत कितने चालान हुए, तो मैड के सदस्य आदर्श त्रिपाठी को जवाब आया कि उत्तराखंड के 100 शहरी स्थानीय निकायों में से केवल 9 स्थानीय निकायों ने इन तीन वर्षों मे 50,000 रुपये से ज़्यादा की चालान धनराशि इकट्ठा करी और 39 तो ऐसे शहरी स्थानीय निकाय निकले जिन्होने शून्य चालान किए थे और शून्य धनराशि इकट्ठा करी थी।
आज के कोरोना संक्रमण के दौर में जहाँ ऐसी गंभीर बीमारी थूकने से फैलती है, इस पर माननीय उच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित करते हुए, याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार को दिशा निर्देश जारी करने की प्रार्थना की जिससे इस अधिनियम के तहत कार्यवाही की जा सके। मामले को गंभीरता से लेते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार के 2 सचिवों, स्वस्थ सचिव एवं शहरी विकास सचिव से 26 मई तक एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है जिसमे उनके द्वारा इस अधिनियम के प्रचार प्रसार एवं कार्यवाही के सम्बंध मे माननीय उच्च न्यायालय को अवगत कराने का कार्य करना होगा। अगली तारीख 26 मई के लिए रखी गयी है।

Abhijay Negi v. State of Uttarakhand